Monday, 10 December 2018

विश्व मानवाधिकार दिवस



10 दिसंबर को पूरे विश्व में विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है। जब कोई इंसान पैदा होता है तो उसे कुछ अधिकार है खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। आजादी, बराबरी और सम्मान के साथ जीने का अधिकार इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है। समाज और सरकारों की जिम्मेदारी होती है की वो किसी इंसान के मानव होने के अधिकारों की रक्षा करें।
भारत में 86 प्रतिशत लोग अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानते हैं। एक संस्था के द्वारा जारी किए गए रिपोर्ट से ज्ञात होता है की सबसे ज्यादा मानवाधिकार के उल्लंघन बुजुर्गों के मामले में होता है।
मानव अधिकार के उल्लंघन के मामले में शहरों की स्थिति अधिक चिंताजनक है। यहां 23 प्रतिशत लोग अमानवीय परिस्थिति में रहने को मजबूर हैं 13 प्रतिशत लोगों को उनकी उम्र के अनुसार उचित भोजन नहीं मिलता है। देश में 68.8 प्रतिशत लोगों को जरूरी दवाएं एवं स्वास्थ्य सेवाएं भी प्राप्त नहीं होते हैं। जो लोग इन अधिकारों से अनजान है उनमें अधिकतर की आयु 60 से 70 वर्ष के बीच की है।
बच्चों के बेहतर  स्थिति पर किए गए अध्ययन में 172 देशों को शामिल किया गया, जिसमें भारत को 116वाँ स्थान प्राप्त हुआ। इस मामले में श्रीलंका(61वाँ), भूटान(93वाँ) और म्यानमार(112वाँ) की स्थिति भारत से बेहतर है। भारत में 3.1 करोड़ बच्चे एवं अवयस्क बाल  मजदूरी में लगे हुए हैं जोकि विश्व की किसी भी अन्य देश से अधिक हैं।
मानवाधिकारों के मामले में सीरिया की हालात सबसे अधिक चिन्ताजनक है। यहाँ पिछले 6 वषों में 5 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई जिसमें बच्चों की सँख्या 26,466 है। वहाँ करीब 1.3 करोड़ लोगों ने अपना घर छोड़ दिया है और शरणार्थी बन गए हैं।
भारत में मानवाधिकार कानून 28 सितंबर, 1993 मे आया था और अक्टूबर, 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया था। पहली बार विश्व मानवाधिकार दिवस की घोषणा संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर, 1948 को किया था।
मानवाधिकारों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम फैसला सुनाए हैं। 25 अप्रैल, 1994 को कोर्ट ने कहा कि सभी को जीवन जीने का और स्वतंत्रता का अधिकार है। जब भी किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी हो तो उसे उसकी वजह बताई जाए। उसे अपने किसी रिस्तेदार को यह बात बताने का मौका दिया जाए। गिरफ्तार किया गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मेट्रोपॉलिटन मेजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
एसिड अटैक पीड़ितों को 3 लाख रुपए मुवावजे के रूप में दिया जाएगा जिसमें कि 1 लाख रूपये एफआईआर दर्ज होने के 15 दिनों के भीतर दिए जाएंगे। पीड़ित के इलाज का सारा खर्च राज्य सरकार को ही वहन करना होगा। कोई भी अस्पताल चाहे निजी ही क्यों न हो मुफ्त इलाज और सर्जरी से मना नहीं कर सकते हैं।
कोर्ट ने किन्नरों को तीसरे जेंडर के रूप में मानयता दी है। कोर्ट ने माना कि वे काफी समय से भेदभाव और अपमान झेल रहे हैं। सरकार को ऐसे कदम उठाए जिससे इन्हें समाज में मान-सम्मान मिल सके।

No comments:

Post a Comment